कभी कभी हम कितने बेबस हो जाते है ,कुछ समझ ही नहीं आता क्या करे क्या ना करे ? बहोत कुछ सोचते है पर कुछ कर नहीं पाते, हमे लगता है हम बहोत आगे बढ़ गए है ,पर फिर एक ऐसा हवा का झोंका तूफान बनकर हमारी जिन्दगी में आता है और हमने जहाँ से चलने की शुरुआत की थी वही आके हम फिरसे खड़े हो जाते है, ऐसा क्यों होता है ? पता नहीं...जितना भी कोशिश करे आगे बढ़ने की ,अपने सपने सच करने की पर ऐसा लगता है जेसे फिरसे शुन्य पे आके जिंदगी रुक गई ,सब कुछ बिखर गया , मंजिल तो पता होती है पर वहाँ पहुँचने के रास्ते कही खो जाते है, क्यों होता है ऐसा ??? बार बार दिल पूछता है अपने आप से यही सवाल पर जवाब.............पता नहीं
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कुछ मकड़ी से सिंखे |
कभी कभी हम इन्सान मुन्क जानवरों से भी गए बीते होते है..क्युकी वो चाहे जो भी हो जाये हार नहीं मानते जेसे की मकड़ी एक ही दीवार पर अपना झाला बुनती है फिर गिर जाती है फिर-फिरसे चढ़ती है और फिर कोशिश करती है बार-बार , पर वो तब तक कोशिश करती है जब तक वो अपना झाला बनाने में सफल ना हो जाए, वेसे ही पंछी अपने घोंसला बनाने के लिए तिनका-तिनका कठ्ठा करते है और कड़ी मेहनत से अपना घोंसला बनाते है...फिर हम मनुष्य क्यों हार जाते है ? हमारे पास इतनी सारी इन्द्रियां उस परमात्मा ने दी हुई है जिससे हम बोल सकते है ,सुन सकते है, देख सकते है ,चल सकते है,खा सकते है , हंस सकते है , रो सकते है, दुःख और सुख को महसूस कर सकते है , सोचने समझने की शक्ति होती है हम में ,फिर भी हम हार जाते है क्यों???
हर रोज अँधेरा होता है उस अँधेरी रात में हम अपनी सारी थकावट भूलकर विश्रांति पाते है, सोचो अगर रात्रि हो ही ना तो, केसा होगा हमारा जीवन?? थका थका ...जेसे दिन के बाद रात्रि जरुरी है वेसे ही सुख के बाद दुःख भी उतने ही जरुरी है जो हमे और ज्यादा मजबूत बनाते है और निखारके बाहर लाता है , जेसे अँधेरी रात के बाद सुबह का सूरज भी जरुर और जरुर उगता है, वेसे ही हर दुःख और मुसीबतों के बाद खुशियां और सफलता भी जरुर और जरुर आती है और कहते है ना एक बड़े संग्राम युध्ध के बाद जीत का मजा ही कुछ और होता है , हम चाहे या ना चाहे हर जीवात्मा के जीवन में दुःख और सुख आता जाता रहता है.. इसीलिए हार मत मानना मित्र...जीवन की अँधेरी रात के बाद खुशियों भरा सूरज जरुर आएगा... "ना रुकना है और ना ही मुसीबतों से भागना है बस चलते रहना है, चलते रहना है "...यही जीवन है...

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