गुरुपूर्णिमा एक अनोखा त्यौहार

गुरुपूर्णिमा..!!!एक अनोखा त्यौहार, सारी पूर्णिमाओ में सबसे विशेष होती है यह गुरुपूर्णिमा..क्योंकि इस दिन सब शिष्य अपने अपने गुरु के लिए अपनी कृतज्ञता को व्यक्त करते है, अपने पर किये गुरु के उपकारों को तहे दिल से धन्यवाद् करते है...
                  क्या कभी आपने सोचा है की अगर हमारे जीवन में गुरु नहीं होते तो क्या होता??? गुरु हमारे जीवन के  सही मान्यो में आधार है क्योंकि किसी भी गुरु के बिना जीवन निराधार हो जाता है , अब गुरु भी बहोत प्रकार के होते है लौकिक गुरु, वैदिक गुरु, सतगुरु...माता हमारी पहली गुरु मानी जाती है क्योंकि  हमारे जनम के बाद हमे पालने की जिम्मेदारी माँ पे होती है , जब हम कुछ बड़े होते है और स्कूल जाते है तब लौकिक ज्ञान देने वाले गुरु होते है वो हमे किताबो का ज्ञान देते है , पर जब इस संसार के बन्धनों से मुक्त करनेवाले और आत्मज्ञान देने वाले गुरु मिल जाते है तो ऐसे सतगुरु का ज्ञान अक्षय और अखूट होता है , संसार की कोई भी वस्तु ,कोई भी परिस्थिति,या कोई इन्सान छोड़ना पड़ता है या छुट जाता है सिर्फ एक मात्र एक ऐसा खजाना है जो सतगुरु से प्राप्त होता है से कोई छुड़ा नहीं सकता मृत्यु का बाप भी छीन नहीं सकता ऐसी आत्मविध्या देने वाले सतगुरु बहोत सौभाग्य से मिलते है

               "न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
              व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥ 
                                     
                               विध्यारुपी धन को कोई चुरा नहि सकता, राजा ले नहि सकता, भाईयों में उसका भाग नहि होता, उसका भार नहि लगता, (और) खर्च करने से बढता है । सचमुच, विध्यारुप धन सर्वश्रेष्ठ है ।"

गुरुपूर्णिमा हर उस शिष्य का त्यौहार है जिसने अपने गुरु से कुछ न कुछ सीखके अपने लघुता छोडके अंधकारमय जीवन से प्रकाशमय जीवन की और गति की हो, ऐसे गुरु के प्रति कृतग्यता व्यक्त करने का दिन है गुरुपूर्णिमा..!!

True Story:-

यह काशी के पंचघाटी की कथा है , एक बार एक  बालक बिना किसीसे पूछे बगीचे से फूल चुन रहा था अपने आचार्य माधवानान्दजी के लिए तब एक संत ने  जिनका नाम राघवानंदजी  था  उनकी नजर उस बालक पर पड़ी और उन्होंने उससे पूछा की तुम कौन हो?? बिना पूछे क्यों फूल चुरा रहे हो?? बालक ने कहा  महाराज.! मेरा नाम रामदत्त है ,प्रयाग में मेरा जन्म हुआ है और कशी में मैं शिक्षा ले रहा हु यह फूल मैं मेरे आचार्य के लिए चुन रहा हूँ उनका नाम  माधवानंदजी है ,  यह सुनके संत राघवानान्द्जी ने उस बच्चे को कहा तेरे आचार्य को मेरे पास भेजना , माधवानंद जी संत के पास आये और प्रणाम किया तब  राघवानंद जी ने कहा दिए भाती में तेल कम है उस बालक की आयुष्य कम है फिर क्यों उसे किताबी श्लोक रटाया जा रहे हो , माधवानंद जी ने कहा मैं जानता  हु की बालक की उम्र ज्यादा नहीं है पर उसका उपाय में नहीं जानता, यह सुनकर संत राघवान्नाद्जी ने कहा जब तुम्हे उसका तोड़ नहीं पता तो उसे मेरे हवाले कर दो  और उनकी आज्ञा मानकर मधवानन्दजी ने     रामदत्त को संत के हवाले किया उन्होंने दीक्षा दी और वैदिक ज्ञान का सत्संग दिया और देखते जी देखते बालक की  आयुष्य बढ़ने लगी और वे संत रामानंद के नाम से प्रसिध्ध हुए और १११ वर्ष वो धरती पर रहे,  कबीर जी , दादू दीनदयाल जी, रहिदास जी, धन्नाजाट, तुलसीदास जी, सब उनके शिष्य रह चुके है,  यह होते है सतगुरु कहाँ तो अकाल मृत्यु होनेवाली थी और कहाँ तो बच्चा महान संत बने और १११ साल धरती पर रहे सतगुरु के दर्शन से कृपा से , करुना से जीवन सफल हो जाता है ...यह अनुभव हर सतगुरु के शिष्य को होते है..

             गुरु का अर्थ है जो हमे लगु जीवन से , लगु मान्यताओ से, लघु सोच से उन्नति ,प्रकाश या गुरुता की और ले जाये वो होते है सतगुरु..! जो हमारी बिखरी हुई जीवनशैली को सुव्यवस्थित करने के लिए ज्ञानरुपी खाजाना देने वाले सतगुरु होते है मनुष्य जनम लेते  ही तीन शक्तियों से संपन्न होता है ...करने की शक्ति, मानने की शक्ति, जानने की शक्ति, जब सतगुरु मिल जाय और मनुष्य अपने आपको जान ले तब जीवन सफल हो जाता है और जनम मरण के चक्कर से सदा सदा के लिए मुक्ति... गुरु के उपकारो का बदला तो शिष्य कभी नहीं चूका सकता पर फिर भी अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए आदि पुरातन समय से गुरुपूर्णिमा मनाया जाता है ...

Post a Comment

0 Comments

Featured Post